बौध्दिक-अहिसा - अहिसा-हिंसा आदि का मुख्य करण बुध्दि है। यही भले-बुरे का निर्णय करके, वचन तथा कर्म में मन को प्रवृत्त करती-कराती है।
अत: बौध्दिक-वाचिक-कायिक हिंसा का सर्वथा परित्याग कर देना ही पूर्ण अहिंसा है। तब किसी प्राणी के द्वारा कष्ट-अपमान-हानि पाकर भी बुध्दि में उत्तेजना नहीं होती। बदला लेने का - अपराधी को दण्ड देने का भाव तक उत्पन्न नहीं होता।
वाचिक-अहिंसा - वाचिक-हिंसा भी कई प्रकार से की जाती है; कटु वाणी से किसी का अपमान करना, उत्तेजक वचन बोलना, किसी के वध की आज्ञा देना, किसी के अनिष्ट करने का परामर्श देना, आदि वाचिक-हिंसा है। कटु-कठोर वचनों से प्रत्येक मनुष्य को आघात पहुँचता है।
उपाय: मुधर वचन बोलना, निश्छल वाणी का सदा प्रयोग करा तथा सामर्थ्य और समयानुसार मौन रखना।
शारीरिक-अहिंसा - यदि बौध्दिक और वाचिक-हिंसा का अभ्यास हो जाये, तब शारीरिक-अहिंसा रूक जाती है। शारीरिक-अहिंसा का तात्पर्य है, किसी प्राणी को शरीर से पृथक् कर देना-मार डालना। स्वाद लोलुपतावश जीव हिंसा करना।
जब पैर में काँटा चुभ जाने मात्र से इतना बड़ा शरीर काँप उठता है, तब प्राणघात के समय उस प्राणी को कितना कष्ट होता होगा, यह सहज ही अनूमान किया जा सकता है।
बौध्दिक सत्य: जब तक सब प्रकार से निश्चय करके बुध्दि किसी बात को स्वीकार नहीं कर लेती, तब तक बोलना तथा व्यवहार करना कई बार असम्भव हो जाता है। वाद-प्रतिवाद आदि में सन्तुलन करके निर्णय कर लेना ही बौध्दिक सत्य है। इसलिए योगी हो या भोगी, जो भी सत्यासत्य का निर्णय करके वचन बोलेगा, उसी अनुसार कर्म करेगा, वह सफल होगा, यशस्वी तथा श्रध्देय बनेगा।
सत्यप्रतिष्ठायां क्रिया फलाश्रयत्वम् । ( योग २-३६)
यह सूत्र स्पष्ट कह रहा है कि सत्यनिष्ठ व्यक्यि का वचन सदा फलीभूत होता है।
वाचिक-सत्य - बौध्दिक सत्य की प्रतिष्ठा हो जाने पर ही निर्भयता से सत्य भाषण भी हो सकता है। अन्यथा लोभ, क्रोध, मोह, राग, द्वेष, भय के वशीभूत होकर मनुष्य मिथ्या-भाषण तथा मिथ्या-आचरण करते देखे और सुने जाते हैं। अत: सत्य भाषण के व्रती को यह बात सदा स्मरण रखनी चाहिए कि वह सत्य, मित एंव हितभाषी हो।
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् मा ब्रूयात् सत्यमप्रियम् । प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्म: सनातन:।
अर्थात् - सत्य बोलें, परन्तु प्रिय शब्दों में बोलें, परन्तु प्रिय लगने के लिए असत्य भाषण न करें, ऐसा पुरातन विधान है। जैसे नेत्रहीन को अन्धा कह देना सत्य है, चोर को चोर कह देना भी सत्य है- किन्तु यह अप्रिय सत्य है, इसीलिए नेत्रहीन को सूरदास, प्रज्ञाचक्षु आदि शिष्ट शब्दों से सम्बोधित किया जाता है ।
मित्रद्रोही कृतध्नश्च तथा विश्वासधातका:, त्रयसते नरकं यान्ति यावच्चन्द्रदिवाकरौ।
अर्थात् - मित्र से द्रोह करनेवाला, कृत उपकार को न मानने वाला, विश्वास दिलाकर उससे मुकर जानेवाला, ये तीनों प्रकार के व्यक्ति जब तक चन्द्र-सूर्य उदय-अस्त होते रहेंगे, सदा नारकीय कष्ट पाते रहेंगे।
शारीरिक सत्य - शारीरिक सत्य का अभिप्राय है, विचार में तथा भाषण में अाये सत्य का कर्म द्वारा आचरण करना। बुध्दि, वचन, कर्म इन तीनों में समान रूप से बना रहनेवाला 'सत्य' कहा जाता है।
'महाजनो येन गत: स पन्था' अर्थात् जैसा आचरण महान् पुरुष करते आये हैं - कर रहे हैं वही आचरण श्रेष्ठ है, करने योग्य है, वही कर्तव्य तथा धर्म है।
बौध्दिक अस्तेय - दूसरों के पदार्थां की ओर ध्यान भी न करना - विचार भी न करना - दृष्टिपात भी न करना ।
अर्थात् अन्न, वस्र, द्रव्य, भूमि, सम्पति, नारी, विध्या, विचार आदि किसी भी ऐसे पदार्थ को लेने का विचार स्वप्न में भी उत्पन्न न होना, यह अस्तेय का पूर्ण स्वरूप है। अत: लोभ, मोह, तृष्णा, क्रोधादि के वशीभूत होकर भी परद्रव्यादि करण का विचार तक बुध्दि से निकाल फेंकना चाहिए।
वाचिक-अस्तेय - अपने कथन से भी किसी को चोरी, डाके आदि में प्रवृत न करना; वाचिक अस्तेय है।
शारीरिक-अस्तेय - विचार तथा वचन के अनुसार शारीरिक व्यापार से भी किसी के पदार्थ की चोरी-लूट आदि न तो स्वयं करना न दूसरे से कराना, यह शारीरिक-अस्तेय है। छल-बल-दल प्रयोग से स्वामी की आज्ञा के बिना उनके पदार्थ को अपना लेना तो स्पष्ट ही घृणित-निन्दकीय स्तेयकर्म ( चोरी और डाका ) है।
ब्रह्मचर्य गुप्तेन्द्रियस्योपस्थस्य संयम:
अर्थात् गुप्तेन्द्रिय-मूत्रेन्द्रिय का संयम रखना ब्रह्मचर्य है। कामवासना को उत्तेजित करनेवाला कर्म, दर्शन, स्पर्शन, एकान्तसेवन, भाषण, विषय का ध्यान-कथा आदि कर्मों से बच कर ब्रह्मचारी को सदा जितेन्द्रिय होना चाहिए।
गृहस्थ-जीवन
सर्वेषामपि चैतेषां वेद स्मृति विधानत:शुक्र सौम्य सितं स्निग्धं बल पुष्टिकरं स्मृतम्
गर्भबीजं वपुसारो जीवस्याश्रय उत्तम:।१
ओजस्तु तेजो धातूनां शुक्रान्तानां परं स्मृतम् ,
हदयस्थमपि देह स्थिति निबन्धनम् ।२
अर्थात् - यह शुक्र पवित्र, शीतल, चिकना, बलपुष्टिदायक है, इस बीज से बालक-बालिका उत्पन्न होते हैं; जीवन का सार और जीवन का मुख्याश्रय व ज्योति है। देह को स्थिर रखने वाले रस, रक्त, मांस, मज्जा आदि सात धातुओं का सार शुक्र है और शुक्र तेज एवं ओज है। यह समस्त देहव्यापी पदार्थ देह की स्थिति का स्थापक है, अत: इस अमूल्य निधि की सर्व प्रकार रक्षा करनी चाहिए।
बौध्दिक ब्रह्मचर्य - किसी प्रकार से रति-भावना बुध्दि में उत्पन्न न होने देना बुध्दि द्वारा ब्रह्मचर्य पालन करना है, गीता का कथन है-
विषयान् ध्यायतो पुंस: सगं स्तेषूपजायते,
संगात् सज्जायते काम: कामात् क्रोधो।़भिजायते।
अर्थात् - विषयों का विचार करने से उन विषयों के संग की इच्छा-पूर्ति की कामना उपजती है, और उस संग से काम की इच्छा जाग्रत होती है। इससे स्पष्ट है कि ऐसा साहित्य न पढ़ें, ऐसा दृश्य न देखें, ऐसी बात न सुनें - करे जो कामवर्ध्दक एवं उत्तेजक हो। काम का मुख्य रूप में सम्बन्ध स्त्री से माना जाता है।
स्मरणं कीर्तनं केलि: प्रेक्षणं गुप्तभाषणम्,
सङल्पाध्यवसायश्च क्रियानिर्वृत्तिरेव च।
एतन्मैथुनमष्टाङं प्रवदन्ति मनीषिण:,
विपरीतं ब्रह्मचर्यमेतदेवाष्टलक्षणम्। २, सुश्रुत
अर्थात् - नारी का स्मरण, स्त्रियों की चर्चा करना, उनके साथ खेलना-कूदना, यौवन और सौन्दर्य से आकृष्ट होकर बार-बार देखना, एकान्त में बातें करना, भोग-विलास की बातें सोचना तथा करना, फिर नारी की प्राप्ति की कामना करना यहा अब्रह्मचर्य है तथा इनका पूर्णतया त्याग ही ब्रह्मचर्य है।
वाचिक-ब्रह्मचर्य-इसमें विशेष रूप से वाणी का संयम ही किया जाता है। कुछ भी अश्लील न कहना।
शारीरिक ब्रह्मचर्य - स्त्रियों का स्पर्श, पर-नारियों के साथ घुल-मिलकर बैठना, यात्रा करना, आना-जाना आदि शारीरिक कर्म ब्रह्मचर्य के नाशक हैं। - नारियों के साथ नाचना, चूमना आदि आर्य-संस्कृति के विपरीत आचरण है।इस प्रकार हमने देखा कि काम-रोग की चिकित्सा जब नारी के द्वारा की जाती है, तभी कष्टप्रद संसार के विस्तार में फँसकर मनुष्य जन्म-मरण के कष्ट-चक्र में फँसा रहता है।
सत्त्वशुध्दि सौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शन योग्यत्वानि च। २-४१
अर्थात् - मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा के अभ्यास से चित्त शुध्द होकर सौम्य-शान्त बन जाता है। चित्त, बुध्दि, मन में एकाग्रता बढ़ने लगती है, इन्द्रियों पर विजय प्राप्त हो जाती है। आत्मदर्शन की योग्यता आ जाती है - और ब्रह्मदर्शन का अधिकार मिल जाता है।
सन्तोष नियम का दूसरा अगं सन्तोष है। - प्राप्त धन से अधिक की लालसा न करना; कम होने पर शोक न करना।
बौध्दिक सन्तोष - धन- ऐश्वर्यादि भोग-सामग्री की लालसा में किसी प्रकार का 'गिला' व रोष बुध्दि में न उपजे; और ऐश्वर्य होने पर हर्षत न होकर; आवश्यकता से अधिक को त्याग देने का विचार रहे - यह बौध्दिक सन्तोष है। जब विचारपूर्वक अपने भाग्य पर विश्वास दृढ़ होगा, तभी तो किसी का धन ग्रहण न करने का विचार तथा आचरण भी होगा। सन्तोषरूपी अमृत से तृप्त शान्तचेता महापुरुषों को सुख मिलता है, वह धन-ऐश्वर्य के लोभी इधर-उधर भागने वालों को प्राप्त नहीं होता।
न योजनशतं दूरं बाध्यमानस्य तृष्णया,
सन्तुष्तस्य कर प्राप्तेप्यर्थे भवति नादर:। ( सुभाषित २०-१०)
अर्थात् - तृष्णा के दास बने मनुष्य के लिए सैकड़ों मीलों की दूरी भी दूरी नही है। वह देश-विदेश में अर्थकामना पूर्ति के लिए मारा-मारा फिरता है; परन्तु सन्तुष्ट योगी समीप आयी लक्ष्मी को भी ठुकरा देता है।
आचार्य यम ने प्रसिध्द बालक नचिकेता की परीक्षा करते हुए आत्मजिज्ञासा के बदले में जब अतुल भोग-सामग्री देने को कहा तो उस परमसन्तोषी विरक्त-बुध्दि का दिया उत्तर पुन:-पुन: दोहराने योग्य है-
वोभावामत्र्यस्य यदन्तकैतत् सर्वेन्द्रियाणां जरयन्तितेज:,
अपि सर्वजीवितमल्पमेव तवैववाहास्तव नृत्यगीते।
न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्योलप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्मचेत्त्वा,
जीविष्यामो यावदीशिष्यसित्वं, वरस्तु मे वरणीय स एव। ( कठ॰ २६-२७)
हे आचार्य! यम, उत्पन्न हुए मनुष्य तथा सब ऐश्वर्यादि पदार्थ नाशवान हैं, आज नहीं तो कल नष्ट हो जायेंगे तथा इन्द्रियों के तेज को भी भस्म कर जायेंगे; कितना ही लम्बा हो - जीवन क अन्त भी होना ही है, उस के पीछे ये सब ऐश्वर्य यहीं पड़े रहेंगे। ऐश्वर्य से मनुष्य तृप्त हो गया हो, ऐसा सम्भव नहीं है। मनुष्य भी अपनी आयु से अधिक जीवित नहीं रह सकता। अत: हे आचार्य! मुझे आत्म ज्ञान का ही वरदान दीजिए ।
जिस महापुरुष की बुध्दि विवेक से तृप्त तथा सन्तुष्ट हो गयी है, उसे सर्वत्र सम्पदा-ही सम्पदा मिलती है।
आशा के दास बने व्यक्ति संसार के ही दास बन जाते हैं। जिन्होने आशा को दासी बना लिया है, यह संसार उनका दास बन जाता है। अत: लोभ, मोह, राग, आशा, तृष्णादि के वशीभूत न होकर सदा सन्तोष का आश्रय ग्रहण करें।
वाचिक-सन्तोष - वाचालता को त्याग देना वाचिक - सन्तोष है।
कटुवचन सुनकर, अपमानित होकर, हानि उठाकर भी क्रोधादि से आवेश में न आकर दुर्वचनों का त्याग, निवृत्ति का उपदेश, स्वल्प भाषण, विवाद का त्याग, गुरुजनों से प्रताड़ित होकर भी प्रत्युत्तर न देना तथा यथाशक्ति मौन रहना आदि वाचिक-सन्तोष कहा जाता है। वाणी के द्वारा होने वाले सभी दुर्व्यवहारों का परित्याग कर देने से वाचिक-सन्तोष की प्रात्पि होती है।
शारीरिक सन्तोष - शरीर से हिंसा, चोरी, व्यभिचार, विषयों का उपभोग, किसी का अपकार, बलात्कार, अत्याचार आदि दुष्कर्म करना तथा काम-क्रोधाधि विकारों से प्रभावित होकर कुकर्म न करना एंव दीन-दुखियों की सेवा, ब्रह्मचर्य का पालन, सत्कर्मो का अनुष्ठान करना शारीरिक सन्तोष है।
यह आशा मनुष्य का भक्षण करने वाली राक्षसी अथवा विष की बेल के समान है। इसलिए सर्व प्रकार से आशा-तृष्णा को त्यागकर परम सन्तोष धारण करने वाले की सर्वत्र पूजा होती है।
प्रणवादि पवित्राणां जपो मोक्षशास्त्राध्ययनं वा। ( २-१)
अर्थात् - ओंकार, गायत्री आदि पवित्र करने वाले मन्त्रों का जप करना।
प्रार्थना गीतों और भजन आदि गाकर अथवा उपदेश द्वारा करना-कराना;
गीता, रामायण, पुराण आदि की कथा करना-कराना;
गुरुद्वारा ग्रन्थों का अध्ययन करना स्वाध्याय है।
गीता पाठ: रजनी सतीश
ईश्वर प्रणिाधानं सर्वक्रियाणां
परमगुरावर्पणन्तत्फल संन्यावा ।। ( योग २-१ भाष्यकार )
अर्थात् - जितने भी कर्म बुध्दि, वाणी और शरीर से किये जाते हैं उसे परम-गुरु भगवान् के अर्पण कर देना ।
पहले जितने आचार्य हुए वे सब काल का ग्रास बन चुके; शरीर-त्याग चुके;
काल से जिसका नाश नहीं होता, ऐसा नित्य-अविनाशी उन गुरुजनों का भी गुरु होने से परमगुरु है।
भगवान् को हम वही समर्पित कर सकते हैं जो शुभ है, दिव्य व पवित्र है।
सो बुध्दि से मलिन विचारों को निकालकर श्रेष्ठ भाव भरे ।
बुध्दि के द्वारा मन इन्द्रियों पर पूर्ण अधिकार रखकर इन्हें बेलगाम घोड़े के समान विषयों की और दौड़ने न देना।
यह बौध्दिक-ईश्वर प्रणिाधान हैं।